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Breast cancer: मध्यप्रदेश में 35 से 37 साल की उम्र की महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में

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Breast cancer: मध्यप्रदेश में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर एक चिंताजनक स्थिति सामने आई है। जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों द्वारा की गई रिसर्च में पाया गया है कि प्रदेश में 35 से 37 साल की उम्र की महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में आ रही हैं, जबकि देशभर में औसत उम्र 40 से 45 साल के बीच है। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूरोपियन जर्नल ऑफ ब्रेस्ट हेल्थ में प्रकाशित हुआ है।

रिसर्च के मुख्य बिंदु:

उम्र और कैंसर का प्रसार:रिसर्च के अनुसार, मध्यप्रदेश की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा अपेक्षाकृत कम उम्र में सामने आ रहा है। इसका प्रमुख कारण ब्रेस्ट कैंसर की ट्रिपल ए नेगेटिव कैटेगरी में वृद्धि बताई जा रही है। यह एक आक्रामक किस्म का कैंसर है जो ब्रेस्ट मिल्क ग्लैंड्स से शुरू होकर ब्रेस्ट के अन्य हिस्सों में तेजी से फैलता है।देशभर में ट्रिपल ए नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर के मामले लगभग 20% होते हैं, जबकि मध्यप्रदेश में यह आंकड़ा 30% तक पहुंच गया है।स्क्रीनिंग की आवश्यकता:रिसर्च में इस बात पर जोर दिया गया है कि ब्रेस्ट कैंसर को शुरुआती चरण में पहचानने के लिए स्क्रीनिंग की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।सोनोग्राफी को एक संभावित स्क्रीनिंग तकनीक के रूप में सुझाया गया है, जिससे कैंसर की पहचान में मदद मिल सकती है।हालांकि, एम्स, भोपाल के डॉक्टरों का मानना है कि सोनोग्राफी इस काम के लिए पर्याप्त नहीं है और कई बार इससे कैंसर की स्पष्ट पहचान नहीं हो पाती। ऐसे मामलों में MRI या ब्रेस्ट बायोप्सी जैसे अधिक सटीक टेस्ट किए जाने चाहिए।

भारत में ब्रेस्ट कैंसर के आंकड़े:

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर दुनिया के सबसे कॉमन कैंसर में से एक है। भारत में हर साल 2 लाख से अधिक महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर से प्रभावित होती हैं।अक्टूबर का महीना ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है, जिसमें आम लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करने के लिए कार्यक्रम चलाए जाते हैं।

प्रारंभिक चरण में ब्रेस्ट कैंसर का पता कैसे लगाएं:

ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षणों में गांठ का बनना, ब्रेस्ट में असामान्य बदलाव, और दर्द शामिल हो सकते हैं। इसके लिए नियमित रूप से सेल्फ एक्जामिनेशन और सोनोग्राफी जैसी स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यदि कोई संदिग्ध मामला हो तो MRI या बायोप्सी की सलाह दी जाती है।

रिसर्च और राय में अंतर क्यों है?

जबलपुर के डॉक्टरों की रिसर्च में सोनोग्राफी को प्राथमिक स्क्रीनिंग तकनीक के रूप में सुझाया गया है, जबकि एम्स, भोपाल के डॉक्टरों का मानना है कि सोनोग्राफी पर्याप्त नहीं है।एम्स के डॉक्टरों के अनुसार, सोनोग्राफी की सीमाओं के कारण इसे केवल एक प्रारंभिक टेस्ट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन सटीक निदान के लिए MRI या बायोप्सी आवश्यक है। मध्यप्रदेश में ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में उम्र घटने और आक्रामक प्रकार के कैंसर की बढ़ती घटनाओं के कारण स्क्रीनिंग और जागरूकता की आवश्यकता बढ़ गई है। स्क्रीनिंग तकनीकों में मतभेद होने के बावजूद, नियमित जांच और उन्नत तकनीकों का उपयोग इस बीमारी को शुरुआती चरण में पकड़ने और बेहतर इलाज में मदद कर सकता है।

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