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उद्धव या बीजेपी, शिंदे की असली दुविधा क्या है

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बीएमसी चुनाव के नतीजों के बाद मुंबई की राजनीति फिर से गरम तवे पर आ गई है। एनडीए को भले ही साफ बहुमत मिला हो, लेकिन सियासत की चालें अभी थमी नहीं हैं। करीब तीस साल तक बीएमसी पर कब्जा जमाए रखने वाले ठाकरे परिवार के लिए यह चुनाव बड़ा झटका माना जा रहा है। वहीं बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और शिवसेना शिंदे गुट सत्ता की चाबी थामे खड़ा है। ऐसे में हर किसी के मन में यही सवाल है कि एकनाथ शिंदे आखिर किससे ज्यादा डर रहे हैं।

बीएमसी के आंकड़े और सत्ता का गणित
बीएमसी में कुल 227 वार्ड हैं और बहुमत का आंकड़ा 114 का है। बीजेपी ने 89 सीटें जीतकर दमदार प्रदर्शन किया है। शिवसेना शिंदे गुट के खाते में 29 सीटें आई हैं। दोनों मिलकर 118 का आंकड़ा पार कर चुके हैं, यानी बहुमत से ऊपर। अजित पवार की एनसीपी को भी 3 सीटें मिली हैं और माना जा रहा है कि उनका झुकाव भी महायुति की ओर रहेगा। आंकड़ों के लिहाज से सत्ता लगभग तय लगती है, लेकिन राजनीति में नंबर गेम के साथ डर भी चलता है।

रिसॉर्ट पॉलिटिक्स का असली मतलब
चुनाव नतीजों के बाद शिंदे गुट के पार्षदों को फाइव स्टार होटल में ठहराया गया, जिससे सियासी हलकों में खलबली मच गई। सवाल उठने लगा कि जब बहुमत साथ है तो फिर यह एहतियात क्यों। जानकार मानते हैं कि शिंदे गुट किसी भी तरह की टूट से बचना चाहता है। विपक्ष अगर एकजुट हुआ तो उसे सिर्फ आठ पार्षद अपने पाले में करने होंगे और पूरा खेल पलट सकता है। इसी डर से रिसॉर्ट पॉलिटिक्स की चाल चली जा रही है।

उद्धव ठाकरे का हमला और बीजेपी का दबाव
उद्धव ठाकरे का सीधा आरोप है कि एकनाथ शिंदे बीजेपी के दबाव में हैं। उनका कहना है कि जो लोग एक बार पाला बदल चुके हैं, वे दोबारा भी ऐसा कर सकते हैं। मेयर पद को लेकर भी अंदरखाने खींचतान तेज है। बीजेपी चाहती है कि मुंबई का मेयर उसी का बने, जबकि शिंदे गुट के लिए यह कुर्सी प्रतिष्ठा का सवाल है। दशकों से शिवसेना का मेयर रहा है और अगर यह परंपरा टूटी तो शिंदे की सियासी जमीन हिल सकती है।

मेयर की कुर्सी और खुली सियासी चुनौती
उद्धव गुट ने अपने मुखपत्र सामना के जरिए शिंदे गुट को खुली चुनौती दी है। सवाल उठाया गया है कि क्या मुंबई को फिर से मराठी मेयर मिलेगा या नहीं। साफ कहा गया है कि चुनाव खत्म हो गए हैं, लेकिन असली राजनीति अब शुरू होगी। यह इशारा है कि मेयर चुनाव आसान नहीं होने वाला और हर कदम फूंक फूंक कर रखा जाएगा।

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देसी सियासी निचोड़
कुल मिलाकर मुंबई की राजनीति अभी शांत होने के मूड में नहीं है। शिंदे गुट एक तरफ विपक्ष की चालों से बचना चाहता है, तो दूसरी तरफ बीजेपी के दबाव को भी संभालना उसकी मजबूरी है। अब देखना यह होगा कि शिंदे किस तरफ ज्यादा झुकते हैं और आखिर मुंबई की सत्ता की चाबी किसके हाथ लगती है।

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