Bharat Ek Soch:कहा जाता है कि जब एक रास्ता बंद होता है तो कई नए रास्ते खुल जाते हैं। यही बात कूटनीति में भी लागू होती है। इस समय पूरी दुनिया की निगाहें चीन के शहर तियानजिन (Tianjin) में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन पर टिकी हुई हैं, जहां चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ही मंच पर होंगे। इन तीनों नेताओं के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिनकी टैरिफ पॉलिसी ने कई देशों को परेशान कर दिया है।
अमेरिका के टैरिफ का भारत पर असर
अमेरिका ने भारत पर 50% आयात शुल्क लगाया है, जिससे भारतीय कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है। कानपुर के चमड़ा व्यापारी, मुरादाबाद के पीतल उद्योग और सूरत के टेक्सटाइल व डायमंड कारोबारी इस फैसले से प्रभावित हुए हैं। उदाहरण के तौर पर, पहले अमेरिका में भारतीय शर्ट 10 डॉलर में मिलती थी, लेकिन अब टैरिफ लगने के बाद उसकी कीमत 16.40 डॉलर हो गई है। वहीं, चीन की शर्ट 14.20 डॉलर और बांग्लादेश तथा वियतनाम की शर्ट और सस्ती मिल रही है। ऐसे में भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में भारी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
चीन क्यों बदल रहा है रुख?
पिछले कुछ वर्षों में भारत और चीन के बीच कई बार तनाव देखने को मिला है, चाहे वह गलवान घाटी, डोकलाम विवाद या LAC पर चीनी साजिशें रही हों। इसके बावजूद हाल ही में चीन भारत से रिश्ते सुधारने की बात कर रहा है। असल वजह है ट्रंप की टैरिफ नीति, जिसने चीन की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया है। चीन जानता है कि भारत की 1.4 अरब की आबादी और बड़ा मिडिल क्लास उनके उत्पादों के लिए विशाल बाजार साबित हो सकता है।
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क्या चीन पर भरोसा किया जा सकता है?
अमेरिका की अर्थव्यवस्था लगभग 30 ट्रिलियन डॉलर की है, जबकि चीन की 19 ट्रिलियन और भारत की करीब 4.19 ट्रिलियन डॉलर। इस स्थिति में भारत को कूटनीति में बेहद सोच-समझकर कदम बढ़ाना होगा। व्यापार इस समय कूटनीति का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। ऐसे में सवाल यह है कि भारत चीन के साथ कितनी दूर तक भरोसा कर सकता है और अमेरिकी टैरिफ से निकलने के लिए कौन से नए बाजार तलाश सकता है।