Betul Politics – मुद्दा विहीन चुनाव से मिलने वाले ताज पर संशय

नहीं सुनाई दिया कोई भी अपीलिंग नारा, बंफर मतदान के मायने निकाल रहे हैं राजनीति समीक्षक

Betul Politicsबैतूल विधानसभा चुनाव 2023 का मतदान 17 नवम्बर को हो गया। इस चुनाव में मतदाताओं ने किसे अपना वोट दिया है यह 3 दिसम्बर को मतगणना के बाद स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन जिला सहित प्रदेश की बात करें तो वर्षों बाद यह विधानसभा चुनाव ऐसा रहा जिसमें कोई अपीलिंग नारा अथवा मुद्दा सुनाई नहीं दिया जिसकी चर्चा गली-मोहल्ले और चौक-चौराहों पर होती सुनाई दी है। कुल मिलाकर विधानसभा चुनाव 2023 मुदृदा विहीन रहा। बावजूद इसके मतदाताओं ने बंफर मतदान किया है।

मतदाताओं द्वारा किया गया यह मतदान किसके लिए है? यह आंकलन लगाना मुश्किल हो रहा है। राजनीति समीक्षक भी अपने-अपने गुणा-भाग में भले ही लगे हुए हैं लेकिन कोई ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि भले ही मतदान को एक पखवाड़ा होने को आ रहा है बावजूद इसके मतदाताओं ने अपना मौन व्रत नहीं तोड़ा है। जबकि मतदान के पहले और मतदान के बाद तो लोग खुलकर सरकार के पक्ष में या विरोध में चर्चा करते थे लेकिन इस बार स्थिति बिल्कुल ही विपरित नजर आ रही है। ऐसे में सवाल यह है कि मुद्दा विहीन चुनाव किसे ताज दिलाएगा?

कोई ना कोई छाया रहता था मुद्दा | Betul Politics

यदि 2003 के चुनाव की बात करें तो कांग्रेस की साल की सत्ता को उखाड़ फेंकने में कामयाब हुई भाजपा की फायर ब्रांड नेता उमा भारती और भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विज सिंह को मिस्टर बंटाधार कहकर संबोधित करते हुए इसे इतना अधिक प्रचारित किया था कि अंतत: यह लोगों की जुबान पर आ गया था। यह नारा इतना अधिक चला था कि कांग्रेस को सत्ता गंवाने और भाजपा को सत्ता नसीब कराने में काफी हद तक निर्णायक साबित हो गया था।

यही नारा 2008 और 2013 में भी चला था। जिसका लाभ भाजपा को मिलता रहा। इसके बाद गत 2018 के चुनाव की ही बात करें तो कांग्रेस ने वक्त है बदलाव का नारा दिया था। यह नारा भी खूब चला और इसका असर यह हुआ था कि 2018 में सत्ता पर आसीन भाजपा सरकार की रवानगी हो गई थी और कांग्रेस का वनवास खत्म हो गया था। यह बात अलग है कि मात्र 15 महीने ही कांग्रेस की सरकार रही और उसके बाद भाजपा पुन: सत्ता में आ गई।

मुद्दा विहीन रहा 2023 का चुनाव

विधानसभा चुनाव 2023 की बात करें तो ना तो भाजपा और ना ही कांग्रेस की ओर से ऐसी कोई पंचलाइन प्रसारित की गई जो कि मुद्दा बन सके। कांग्रेस ने जहां सरकार की योजनाओं और कार्यप्रणालियों की पुरजोर तरीके से आलोचना नहीं कर पाई तो वहीं भाजपा ने अपनी योजनाओं का जमकर प्रसार-प्रसार किया गया, लेकिन एकतरफा स्थिति यहां भी नहीं थी। भाजपा भी सिर्फ योजनाओं के सहारे ही चुनावी वैतरणी पार करने में लगी रही। जबकि प्रदेश में चुनाव का प्रतिशत देखे तो गत चुनाव से मिलता-जुलता ही हुआ है। गत चुनाव में जहां सत्ता परिवर्तन हुआ था तो इस चुनाव में यह मतदान किसके लिए है? इसका आंकलन राजनैतिक समीक्षक भी नहीं कर पा रहे हैं।

नहीं लग रही शर्त और सट्टा | Betul Politics

बैतूल जिले की हॉट सीट मुलताई और बैतूल में ऊंट किस करवट बैठेगा। इसको लेकर ना तो चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवार पूरी तरह से आश्वस्त हैं और ना ही उनके समर्थक। मिली जानकारी के अनुसार इसी के चलते इन दोनों सीटों पर कोई भी सट्टा और शर्त लगाने के लिए आगे नहीं आ रहा है। जबकि होता ऐसा आया है कि मतदान के तुरंत बाद ही समर्थक शर्तें लगाने के लिए बेचैन हो जाते थे।

यही स्थिति प्रदेश की भी बताई जा रही है। ऊंट किस करवट बैठेगा यह बड़े-बड़े राजनैतिक समीक्षक भी स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं। यह बात अलग है कि इंडिया टीवी को छोडक़र बाकी सभी न्यूज चैनल प्रदेश में मात्र कुछ सीटों के अंतर से कांग्रेस की सरकार बनाने की बात कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि कांग्रेस के अधिकांश नेताओं ने शपथ लेने के लिए शूट भी सिलवा लिए हैं। इसके बावजूद कोई स्पष्ट रूप से अपनी जीत का दावा नहीं करवा पा रहा है।