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बैतूल:-सांस्कृतिक, खेलकूद एवं शारीरिक, कौशल विकास, छात्रसंघ शुल्क, ग्रंथालय उन्नयन शुल्क के नाम पर… छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय छात्रों से कर रहा वसूली

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सांध्य दैनिक खबरवाणी, बैतूल:- 2019 में राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय छिंदवाड़ा प्रदेश में भाजपा की सरकार बदलने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ द्वारा अपने वर्चस्व के प्रदर्शन के चलते अस्तित्व में आया। नवीन विश्व विद्यालय के गठन के लिए नियत संख्या में महाविद्यालयों की आवश्यकता होती है, चूंकि इस नए विश्व विद्यालय के गठन में छिंदवाड़ा, सिवनी एवं बालाघाट जिलों को मिलाकर वह संख्या पूरी नहीं हो रही थी इसलिए शासन ने बैतूल जिले को बलि का बकरा बनाया और बैतूल के सभी महाविद्यालयों को बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से असंबद्ध कर छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय से संबंद्ध कर दिया गया।
1. अचानक सितंबर 2019 में इस विश्व विद्यालय के गठन की अधिसूचना जारी हुई तब तक मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2019-20 की प्रवेश प्रक्रिया संपन्न हो चुकी थी। फिर आनन फानन में बैतूल जिले के सभी छात्रों को भोपाल से हटाकर छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय में स्थानांतरित किया गया। जिसके चलते पूरा शिक्षा एवं परीक्षा सत्र गड़बड़ा गया। लगभग 5 वर्ष पूर्ण होने के बाद भी छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय ने एक सामान्य महाविद्यालय से कम संख्या में स्टॉफ है जिसके चलते हर काम महीनों देरी से संपन्न होता है पर शायद इस पर शासन की नजर नहीं है।
2. छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 2019 से प्रतिवर्ष प्रति छात्र 590 रुपए शुल्क लिया जाता है जिसमें सांस्कृतिक, खेलकूद एवं शारीरिक, कौशल विकास केंद्र, छात्रसंघ शुल्क, ग्रंथालय उन्नयन के नाम पर राशि वसूल की जा रही है। जबकि पिछले 6 वर्षों में विश्वविद्यालय द्वारा छात्रों को इन सभी मदो में न तो किसी प्रकार का कोई आयोजन किया गया न ही कोई सुविधा प्रदान की गई। यहां तक कि कोविड काल में भी विश्वविद्यालय ने छात्रों को नहीं बख्शा। हद तो तब हो गई जब कोविड कॉल में ऑनलाइन परीक्षा संपन्नह हुई जिसमें छात्रों ने स्वयं के द्वारा खरीदी गई कॉपियों में उत्तर लिखकर महाविद्यालय को प्रेषित किए और महाविद्यालय द्वारा विश्वविद्यालय को यह कापियां भेजी गई पर विश्व विद्यालय ने लगभग 2300 रुपए प्रति सेमेस्टर, प्रति छात्र की दर से परीक्षा शुल्क लेना नहीं छोड़ा। एक और कारनामा छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय के नाम शामिल है जिसमें उन्होंने कोविड काल में जब पूरा देश लॉकडाउन था तब 15 मई 2020 को परीक्षा परिणाम घोषित कर दिया और परीक्षा में लगभग 90 प्रतिशत छात्र या तो फेल हुए या उन्हेें सप्लीमेंट्री आई।
3. चूंकि परीक्षा परिणाम बहुत खराब था इसलिए इसे सुधारने के लिए एक और कारनामा अंजाम दिया गया। इस परीक्षा परिणाम की अंकसूची जारी होने के बाद कुछ महाविद्यालयों से बोला गया कि सीसीए परीक्षा का परिणाम भेजिये, सीसीए परीक्षा एक तरह से प्रायोगिक परीक्षा होती है जिसका प्रावधान परीक्षा कार्यक्रम में नहीं था यानी छात्र को पहले 100 अंकों के प्रश्न पत्र में से परीक्षा लेकर अंकसूची जारी की गई फिर परीक्षा परिणाम सुधारने के लिए महाविद्यालयों पर दबाव डालकर सीसीए परीक्षा का परिणाम मंगाया गया जो कि वास्तव में संपन्न ही नहीं हुई थी। उसके बाद 100 अंकों के प्रश्न पत्र को 80 का कर दिया गया और सीसीए परीक्षा के 20 अंक जोडक़र नई अंकसूची देकर परीक्षा परिणाम पहले से थोड़ा बेहतर किया गया पर यह पूरी तरह से अवैध है, चूंकि न तो विश्व विद्यालय दो अंकसूची जारी कर सकता है और न ही एक बार परीक्षा कार्यक्रम जारी होने के बाद परीक्षा संपन्न होने के बाद उस कार्यक्रम को अपनी मर्जी से बदल सकता है। चूंकि उस समय मध्यप्रदेश में भूतपूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार थी और छिंदवाड़ा का मामला था इसलिए इतना बड़ा घोटाला होने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।

– करोड़ों में जमा हुई है राशि

बैतूल जिले में लगभग प्रतिवर्ष 25 हजार छात्र विभिन्न महाविद्यालयों में अध्ययनरत होते हैं, इसी तरह छिंदवाड़ा, सिवनी एवं बालाघाट जिलों की छात्र संख्या जोड़ लें तो यह लगभग एक लाख के आसपास होती है। अर्थात विश्वविद्यालय लगभग 5 से 6 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष छात्रों से इन मदों में वसूल कर रहा है। अर्थात पांच वर्षों में लगभग 30 करोड़ रुपए की राशि एकत्र हुई होगी। क्या विश्वविद्यालय प्रशासन इस 30 करोड़ रुपए का छात्रों के उन्नयन के लिए किए गए कार्यक्रमों में व्यय का ब्योरा देने से बच रहा है।

– आवेदक से ही पूछा जानकारी मांगने का कारण

अब बात करें 590 रुपए के जो शुल्क वसूले जा रहे हैं उस पर विश्व विद्यालय में अध्ययनरत छात्र आशीष नागले द्वारा जब सूचना का अधिकार में जानकारी चाही गई कि विश्वविद्यालय द्वारा इस मद में कितनी राशि पांच वर्षों में एकत्रित की गई और उसका छात्रों के उन्नयन में क्या उपयोग किया गया तो विश्व विद्यालय के कुल सचिव द्वारा 2 बार फोन कर उन्हें मिलने बुलाया गया और यह भी पूछा गया कि जानकारी क्यों चाहिए। हद तो तब हो गई जब छात्र ने मिलने से मना कर दिया और जानकारी देने पर जोर दिया तो छात्र को अधिकृत तौर पर पत्र जारी कर उससे पूछा जा रहा है कि जानकारी औचित्य क्या है और स्वयं प्रस्तुत होकर अपना आईडी जमा करें, ताकि जानकारी दी जा सके। सूचना के अधिकार की धज्जियां कैसे उड़ाई जा सकती है उसका यह उदाहरण सबके सामने है। विश्वविद्यालय के रजिस्टार युवराज पाटिल को फोन करने पर उनका फोन उपलब्ध नहीं होने से इस मामले में उनका पक्ष सामने नहीं आया है और उनके एवज में डिप्टी रजिस्टार से चर्चा की गई।

– इनका कहना है
चूंकि फाइनेंसियल जानकारी मांगी गई है, इसलिए हमें भी विभागीय रूप से स्पष्ट करना होता है कि जानकारी कहां और किसको दी जा रही है। एक आईडी एवं कारण स्पष्ट हो जाए तो हम जानकारी उपलब्ध करवा रहे हैं।
जगदीश कुमार वाहने, डिप्टी रजिस्टार छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी

– इनका कहना है
मुझे दो बार राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय के रजिस्टार पाटिल जी का फोन आया कि तुम्हे जानकारी क्यों चाहिए अपन बात कर लेते हैं। मैंने स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि मैं नहीं मिलूंगा मुझे आप जानकारी उपलब्ध कराएं।
आशीष नागले, आवेदक (पूर्व छात्र छिंदवाड़ा विश्व विद्यालय)

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