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झांझर में केमिकल युक्त पानी का आरोप:

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खबरवाणी

झांझर में केमिकल युक्त पानी का आरोप:

जनसुनवाई में उठा गंभीर मामला, ग्रामीणों में आक्रोश

बुरहानपुर शहर से करीब 12 से 15 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत झांझर इन दिनों कथित प्रदूषण के मामले को लेकर चर्चाओं में है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि क्षेत्र में संचालित एक फैक्ट्री द्वारा केमिकल युक्त जहरीला पानी पाइपलाइन के माध्यम से नालों में छोड़ा जा रहा है, जो आगे चलकर नदी में मिल रहा है। यह पानी पशुओं और ग्रामीणों के उपयोग में भी आ रहा है, जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर खतरे की आशंका जताई जा रही है।

जनसुनवाई में उठी आवाज

इस मामले को हाल ही में आयोजित जनसुनवाई में समाजसेवी तोताराम खंडेराव ने उठाया। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित फैक्ट्री प्रबंधन पर सख्त कार्रवाई की जाए। जनसुनवाई में मौजूद अधिकारियों ने शिकायत दर्ज कर जांच का आश्वासन दिया है।
ग्रामीणों का आरोप: दूषित पानी पीने को मजबूर
ग्राम झांझर के कुछ ग्रामीणों का कहना है कि नालों में छोड़ा जा रहा पानी बदबूदार और झागयुक्त दिखाई देता है। उनका आरोप है कि यही पानी आगे चलकर नदी में मिल रहा है, जहां से पशु—गाय, भैंस, ढोर-डंगर—पानी पीते हैं। कुछ ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जलस्रोतों के प्रभावित होने से उन्हें इसी पानी का उपयोग घरेलू कार्यों और कभी-कभी पीने के लिए भी करना पड़ रहा है।
हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर संभावित खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी औद्योगिक इकाई द्वारा बिना शोधन (ट्रीटमेंट) के रासायनिक अपशिष्ट जल छोड़ा जाता है, तो इससे जल प्रदूषण, मृदा क्षरण और जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। पशुधन पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे मामलों में पर्यावरणीय मानकों का पालन अनिवार्य होता है

कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं?

पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत कड़े प्रावधान हैं। बिना अनुमति या मानकों के विपरीत अपशिष्ट जल छोड़े जाने पर संबंधित इकाई के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई, जुर्माना या संचालन पर रोक तक लगाई जा सकती है।
मामले में यह भी देखा जाएगा कि संबंधित फैक्ट्री के पास अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र (ईटीपी) है या नहीं, और यदि है तो उसका संचालन नियमों के अनुरूप हो रहा है या नहीं।

प्रशासन की भूमिका पर सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि यदि शिकायतें पहले भी की गई थीं तो अब तक कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं हुई। लोगों में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या गरीब और ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। संबंधित विभाग को जांच के निर्देश दिए गए हैं। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।

निष्पक्ष जांच की मांग

समाजसेवी संगठनों ने मांग की है कि जल नमूनों की प्रयोगशाला जांच कराई जाए, रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और दोषी पाए जाने पर सख्त दंड दिया जाए। साथ ही, प्रभावित ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की भी मांग की गई है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और प्रशासन इस गंभीर आरोप पर क्या कदम उठाता है। यदि आरोप सत्य पाए जाते हैं तो यह मामला केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि ग्रामीणों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा बड़ा मुद्दा साबित हो सकता है।

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