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63 साल पुरानी परंपरा, अब नई पीढ़ी के कंधों पर जिम्मेदारी: बजरंग मंदिर का नव पारायण बना सांस्कृतिक विरासत

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खबरवाणी

63 साल पुरानी परंपरा, अब नई पीढ़ी के कंधों पर जिम्मेदारी: बजरंग मंदिर का नव पारायण बना सांस्कृतिक विरासत

1963 से चली आ रही परंपरा में इस बार युवाओं की बढ़ी भागीदारी, नवरात्रि में आस्था के साथ सामाजिक एकजुटता का भी दिख रहा असर

भौरा। चैत्र नवरात्रि में नगर के बजरंग मंदिर में जारी नव पारायण पाठ इस वर्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक विरासत के रूप में सामने आ रहा है। 1963 में शुरू हुई यह परंपरा 63 वर्षों बाद भी उसी आस्था के साथ जारी है, लेकिन इस बार आयोजन में युवाओं की बढ़ती भागीदारी इसे नया आयाम दे रही है। नवरात्रि के पहले दिन से शुरू हुआ नव पारायण पाठ प्रतिदिन शाम को विधि-विधान के साथ किया जा रहा है,जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं। खास बात यह है कि इस बार बुजुर्गों के साथ युवा वर्ग भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है, जिससे परंपरा के निरंतर बने रहने के संकेत मिल रहे हैं।

परंपरा से विरासत तक का सफर

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, 1963 में बजरंग मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही नव पारायण पाठ की शुरुआत हुई थी। उस दौर में धार्मिक आयोजन कम होते थे, ऐसे में यह पहल सामाजिक एकजुटता का माध्यम बनी। संस्थापक सदस्यों में स्व. राम किशोर सिरोठिया, स्व. शंकरलाल दुबे, स्व. गोविंद यादव, स्व. रामकरण मालवीय और स्व. कृष्णलाल जुनेजा का अहम योगदान रहा।
समय के साथ जिम्मेदारियां बदलती रहीं, लेकिन परंपरा कभी नहीं टूटी। 2010 से दीपक उपाध्याय और संतोष नायक आयोजन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जबकि पिछले 30 वर्षों से अशोक सिरोठिया व्यास गद्दी पर बैठकर रामचरितमानस का पाठ करा रहे हैं।

युवा पीढ़ी की बढ़ती भागीदारी

इस वर्ष आयोजन में युवाओं की सक्रियता साफ दिखाई दे रही है। व्यवस्था से लेकर पाठ में सहभागिता तक, युवा वर्ग आगे आ रहा है। आयोजन समिति का मानना है कि यही भागीदारी इस परंपरा को भविष्य में भी जीवित रखेगी। दीपक उपाध्याय का कहना है कि नव पारायण केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हमारी पहचान है। इसे आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को जोड़ना जरूरी है।

आस्था के साथ सामाजिक संदेश भी

यह आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक समरसता और सहयोग की मिसाल भी पेश करता है। नगर के लोग स्वेच्छा से सहयोग राशि और खाद्य सामग्री देकर भंडारे में योगदान देते हैं। जगदीश मालवीय के अनुसार, यह आयोजन समाज को जोड़ने का काम करता है, जहां हर वर्ग के लोग एक साथ आते हैं। वहीं पांडे गुरुजी ने इसे नगर की एकजुटता का प्रतीक बताया।

विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं टूटी परंपरा

कोरोना काल जैसी चुनौतीपूर्ण स्थिति में भी यह परंपरा नहीं रुकी। 2020 में श्रद्धालुओं ने घरों में रहकर पाठ किया, जबकि 2021 में सीमित संख्या में मंदिर में आयोजन हुआ। इससे इस परंपरा की गहराई और लोगों की आस्था का अंदाजा लगाया जा सकता है।

दशमी पर होगा विशाल भंडारा

नवरात्रि की दशमी तिथि पर यहां विशाल भंडारे का आयोजन होगा, जिसमें हर साल की तरह हजारों श्रद्धालु शामिल होने की संभावना है। इस बार का आयोजन यह संकेत दे रहा है कि बजरंग मंदिर का नव पारायण पाठ अब केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भौरा की जीवंत सांस्कृतिक पहचान बन चुका है, जिसे अब नई पीढ़ी आगे बढ़ाने के लिए तैयार दिख रही है।

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