भारत में होली का नाम लेते ही रंग, गुलाल और ढोल-नगाड़ों की गूंज याद आ जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि झांसी जिले के खरहरी गांव में पिछले करीब 150 साल से होली नहीं मनाई जाती? यहां न रंग उड़ता है, न होलिका दहन होता है और न ही ढोल की थाप सुनाई देती है। आइए जानते हैं इस अनोखी परंपरा की पूरी कहानी।
150 साल पुरानी दुखद घटना
कहते हैं करीब डेढ़ सौ साल पहले होलिका दहन के दौरान गांव में बड़ा हादसा हो गया था। आग बेकाबू होकर कई घरों तक फैल गई। देखते ही देखते खुशियों का त्योहार मातम में बदल गया। गांव वालों को भारी नुकसान झेलना पड़ा। उस दिन की वह मनहूस घड़ी आज भी बुजुर्गों की जुबान पर जिंदा है।
पंचायत का कड़ा फैसला
हादसे के कुछ समय बाद गांव के एक प्रमुख परिवार में अचानक मौत हो गई। इसे लोगों ने अपशकुन माना। तब गांव की पंचायत बैठी और फैसला लिया कि अब गांव की हद के भीतर कभी होली नहीं मनाई जाएगी। यह फैसला सबने मान लिया और आज तक निभाया जा रहा है।
नहीं होता होलिका दहन
जहां पूरे देश में होलिका दहन धूमधाम से होता है, वहीं खरहरी गांव में यह परंपरा पूरी तरह बंद है। यहां न लकड़ियां जुटती हैं और न कोई चिता सजती है। फागुन का महीना यहां बिल्कुल साधारण दिनों की तरह बीत जाता है। न ढोल, न धमाल — बस सन्नाटा।
गांव के बाहर खेलते हैं रंग
गांव वालों को त्योहार से कोई दिक्कत नहीं है। अगर किसी का मन करता है तो वह गांव की सीमा के बाहर जाकर रंग-गुलाल खेल सकता है। लेकिन गांव के अंदर रंग डालना या जश्न मनाना मना है। सब लोग पुरखों की परंपरा को मानते हैं।
परंपरा तोड़ने की कोशिश और डर
कुछ साल पहले इस रिवाज को तोड़ने की कोशिश हुई थी। लेकिन उसी दौरान गांव में बीमारी फैलने की चर्चा हुई। लोगों ने इसे अशुभ संकेत माना। तब से गांव वालों का विश्वास और मजबूत हो गया कि होली न मनाना ही गांव की भलाई के लिए सही है।
इसी वजह से आज भी खरहरी गांव 150 साल पुरानी परंपरा निभा रहा है और पूरे इलाके में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
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