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सिंधु जल संधि पर भारत का दो टूक जवाब: अंतरराष्ट्रीय अदालत का आदेश मंजूर नहीं

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सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को लेकर पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कानूनी दांव-पेंच खेलने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भारत ने इस बार बिल्कुल साफ और सख्त रुख अपनाया है। भारत ने साफ शब्दों में कह दिया है कि वह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत (Court of Arbitration) के किसी भी आदेश को नहीं मानता, क्योंकि यह अदालत भारत की नजर में अवैध रूप से गठित की गई है।

अंतरराष्ट्रीय अदालत ने क्या आदेश दिया था

जनवरी 29, 2026 को तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने “प्रोसीजरल ऑर्डर नंबर 19” जारी किया। इसमें भारत से बगलिहार और किशनगंगा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के ऑपरेशनल रिकॉर्ड यानी पोंडेज लॉगबुक जमा करने को कहा गया। अदालत ने इन दस्तावेजों को “मेरिट्स के दूसरे चरण” की सुनवाई के लिए जरूरी बताया और 9 फरवरी 2026 तक जवाब देने की समय-सीमा तय की।

भारत ने आदेश क्यों ठुकराया

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत इस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की वैधता को ही स्वीकार नहीं करता। भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि के तहत पहले से एक न्यूट्रल एक्सपर्ट की व्यवस्था मौजूद है, ऐसे में समानांतर अदालत बनाना नियमों के खिलाफ है। यही वजह है कि भारत न तो इस अदालत की चिट्ठियों का जवाब देता है और न ही इसके आदेशों को मानता है।

सिंधु जल संधि पहले ही सस्पेंड

भारत ने अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को औपचारिक रूप से निलंबित कर दिया था। ऐसे में भारत का साफ कहना है कि जब संधि ही सस्पेंड है, तो किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच को जवाब देने की कोई बाध्यता नहीं बनती। भारत का मानना है कि पाकिस्तान जानबूझकर भारत को कानूनी जाल में फंसाने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तान की बढ़ती बेचैनी

इस पूरे विवाद के बाद पाकिस्तान की चिंता साफ नजर आने लगी है। बीते 9 महीनों में पाकिस्तान ने अपने राजनयिकों को सक्रिय किया, संयुक्त राष्ट्र में पत्र लिखे, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन किया और दर्जनों कानूनी याचिकाएं दायर कीं। वजह साफ है—पाकिस्तान की खेती का करीब 80 से 90 फीसदी हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है।

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पानी बना पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी

पाकिस्तान की जल भंडारण क्षमता बेहद सीमित है और उसके बड़े बांध—तर्बेला और मंगला—भी लगभग अपनी क्षमता खो चुके हैं। ऐसे में सिंधु जल संधि अब सिर्फ तकनीकी समझौता नहीं, बल्कि भारत के लिए एक रणनीतिक दबाव का हथियार बन चुकी है। यही कारण है कि पाकिस्तान इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछालने में जुटा हुआ है।

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