अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा में शांति स्थापित करने के लिए एक नया वैश्विक मंच ‘बोर्ड ऑफ पीस’ बनाने का ऐलान किया है। इस बोर्ड में सऊदी अरब, तुर्की, पाकिस्तान, कतर, मिस्र, इंडोनेशिया, यूएई और मलेशिया जैसे देश शामिल हो चुके हैं, लेकिन भारत ने अब तक इस पर कोई आधिकारिक सहमति नहीं दी है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत की चुप्पी के पीछे क्या वजह है।
बोर्ड ऑफ पीस आखिर है क्या
डोनाल्ड ट्रंप के मुताबिक यह बोर्ड दुनिया के बड़े संघर्षों जैसे इजरायल-हमास और रूस-यूक्रेन युद्ध में शांति की पहल करेगा। गाजा में युद्ध के बाद शासन व्यवस्था, पुनर्निर्माण और निवेश की जिम्मेदारी भी इसी बोर्ड की होगी। यह एक हाई-पावर ग्रुप होगा, जिसमें राजनीतिक, कूटनीतिक और कारोबारी दिग्गज शामिल हैं।
भारत की विदेश नीति और गुटनिरपेक्ष सोच
भारत की विदेश नीति हमेशा से गुटनिरपेक्ष रही है। भारत किसी एक सुपरपावर के एजेंडे के तहत काम करने से बचता है। अगर भारत इस बोर्ड में शामिल होता है, तो उसे अमेरिका की रूस-यूक्रेन नीति का समर्थन करना पड़ सकता है, जबकि भारत रूस के साथ अपने पुराने और रणनीतिक रिश्ते खराब नहीं करना चाहता। भारत खुद को “सबका मित्र” मानता है, न कि किसी एक खेमे का हिस्सा।
चीन फैक्टर भी है बड़ी वजह
ट्रंप का यह बोर्ड परोक्ष रूप से चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिश भी माना जा रहा है। भारत किसी ऐसे मंच से दूरी बनाकर रखना चाहता है, जिसे सीधे तौर पर एंटी-चीन गठबंधन समझा जाए। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पहले से मौजूद है, ऐसे में भारत बहुत सोच-समझकर कदम उठाता है।
क्या यह UN को कमजोर करने की कोशिश है
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। भारत नहीं चाहता कि कोई नया मंच UN जैसे वैश्विक संस्थानों की अहमियत को कमजोर करे। इसलिए भारत पहले यह देखना चाहता है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ वास्तव में शांति का मंच है या सिर्फ एक राजनीतिक शो।
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ग्लोबल साउथ की आवाज बनना चाहता है भारत
भारत आज खुद को ग्लोबल साउथ का नेता मानता है। ट्रंप का यह बोर्ड फिलहाल कुछ चुनिंदा अमीर और प्रभावशाली देशों तक सीमित दिखता है। भारत की रणनीति यह हो सकती है कि वह तब तक शामिल न हो, जब तक अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और छोटे एशियाई देशों की आवाज को इसमें जगह न मिले।
कुल मिलाकर भारत का “वेट एंड वॉच” रवैया उसकी परिपक्व कूटनीति को दिखाता है। भारत जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करता, बल्कि हर पहलू को तौलकर ही आगे बढ़ता है। यही वजह है कि ट्रंप के न्योते के बावजूद भारत ने अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है।





