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ISRO का मिशन अधूरा, सवालों में घिरा रॉकेट और सैटेलाइट

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ISRO : साल 2026 का पहला ऑर्बिटल मिशन इसरो के लिए पूरी तरह सफल नहीं हो पाया। सोमवार को पीएसएलवी सी 62 रॉकेट को श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया, लेकिन इसके साथ भेजे गए सोलह सैटेलाइट अपनी तय कक्षा में स्थापित नहीं हो सके। लॉन्च के कुछ ही देर बाद रॉकेट अपने रास्ते से भटक गया। इसके बाद लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि ऐसे मिशन फेल होने पर रॉकेट और सैटेलाइट का आखिर क्या होता है।

तीसरे चरण में आई तकनीकी गड़बड़ी

इसरो प्रमुख डॉक्टर वी नारायणन ने जानकारी दी कि रॉकेट के तीसरे चरण में तकनीकी खराबी आ गई थी। इसी वजह से रॉकेट की दिशा बदल गई और सैटेलाइट अलग नहीं हो सके। इस मिशन में ईओएस एन 1 अन्वेषा समेत कुल सोलह सैटेलाइट थे, जिन्हें एडवांस अर्थ ऑब्जर्वेशन के लिए डिजाइन किया गया था। गड़बड़ी सामने आते ही मिशन को पूरा करना संभव नहीं रह गया।

रास्ते से भटके रॉकेट का क्या होता है

हर रॉकेट में एक खास ऑनबोर्ड कंप्यूटर और सेफ्टी सिस्टम लगा होता है। यह सिस्टम रॉकेट की दिशा, रफ्तार और ऊंचाई पर लगातार नजर रखता है। अगर रॉकेट भटक कर आबादी या जमीन की ओर बढ़ने लगे, तो रेंज सेफ्टी ऑफिसर उसे वहीं नष्ट कर सकता है। ऊंचाई पर खराबी आने की स्थिति में रॉकेट के टुकड़े समुद्र में गिरा दिए जाते हैं, ताकि किसी तरह का नुकसान न हो।

सैटेलाइट अलग न हो पाएं तो क्या होता है

अगर तकनीकी खराबी सैटेलाइट अलग होने से पहले आ जाए, तो सैटेलाइट रॉकेट के साथ ही नष्ट हो जाते हैं। कुछ मामलों में अगर सैटेलाइट अपने सिस्टम से खुद को कंट्रोल कर सके, तो उसकी कक्षा को सुधारने की कोशिश की जाती है। लेकिन अगर यह संभव न हो, तो मिशन को पूरी तरह रद्द करना पड़ता है। ऐसे सैटेलाइट कुछ समय बाद वायुमंडल में जलकर खत्म हो जाते हैं।

प्वाइंट नीमो में गिराए जाते हैं सैटेलाइट

जो सैटेलाइट पूरी तरह नहीं जल पाते, उन्हें प्वाइंट नीमो नामक जगह पर गिराया जाता है। यह प्रशांत महासागर का वह इलाका है, जो दुनिया की सबसे दूरस्थ जगह मानी जाती है। यहां आसपास कोई आबादी नहीं है, इसलिए इसे अंतरिक्ष कबाड़ गिराने के लिए सुरक्षित माना जाता है। दुनिया की कई अंतरिक्ष एजेंसियां इसी जगह का इस्तेमाल करती हैं।

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इसरो के लिए सीख और आगे की तैयारी

हालांकि यह मिशन अधूरा रहा, लेकिन इसरो के लिए यह अनुभव बेहद अहम है। हर असफलता से नई सीख मिलती है और आने वाले मिशन और मजबूत बनते हैं। इसरो पहले भी कई बार ऐसी चुनौतियों से उबर चुका है और आगे भी नए आत्मविश्वास के साथ अंतरिक्ष में कदम बढ़ाएगा।

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