India-Pakistan: भारत सरकार के एक अहम फैसले के बाद एक बार फिर भारत-पाकिस्तान संबंधों में गर्माहट तेज हो गई है। चिनाब नदी पर बनने वाली दुलहस्ती हाइड्रोपावर परियोजना के दूसरे चरण को पर्यावरण मंत्रालय की एक्सपर्ट कमेटी से हरी झंडी मिलने के बाद पाकिस्तान में सियासी बयानबाजी शुरू हो गई है। पाकिस्तान इसे सिंधु जल संधि का उल्लंघन बता रहा है, जबकि भारत इसे अपना आंतरिक और वैध विकास कार्य मान रहा है।
दुलहस्ती परियोजना को मिली मंजूरी
27 दिसंबर को भारत के पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट स्टेज-2 को पर्यावरणीय मंजूरी दे दी। यह परियोजना चिनाब नदी पर स्थित है और इससे करीब 260 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना है। इस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में ऊर्जा उत्पादन और विकास को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है।
पाकिस्तान की सियासी बौखलाहट
भारत के इस कदम से पाकिस्तान में हड़कंप मच गया है। पाकिस्तानी सांसद और पूर्व जलवायु मंत्री शेरी रहमान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भारत पर निशाना साधते हुए कहा कि “पानी को हथियार बनाना गलत है और किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं है।” उन्होंने आरोप लगाया कि भारत एकतरफा तरीके से सिंधु जल संधि से पीछे हट रहा है।
चिनाब पर कई प्रोजेक्ट्स को लेकर आरोप
शेरी रहमान ने दावा किया कि भारत चिनाब नदी पर एक के बाद एक विवादित परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने सावलकोट, रैटल, बर्सार, पकल डुल, किरू, किर्थाई और अब दुलहस्ती स्टेज-2 का नाम लेते हुए कहा कि ये सभी प्रोजेक्ट पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय हैं। पाकिस्तान इसे जल सुरक्षा से जोड़कर देख रहा है।
पहलगाम हमले के बाद बदला रुख
इस साल 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 22 पर्यटकों की मौत के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। इसके बाद भारत ने कई कड़े कदम उठाए, जिनमें सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से निलंबित करना और पाकिस्तान के साथ नदी से जुड़ा डेटा साझा करना बंद करना शामिल है। इसका सीधा असर पाकिस्तान की जल योजना और परियोजनाओं पर पड़ रहा है।
“खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते”
आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ शब्दों में कहा था कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।” भारत का मानना है कि वह अपने हिस्से के पानी और संसाधनों का उपयोग करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। दुलहस्ती और सावलकोट जैसी परियोजनाएं न सिर्फ बिजली उत्पादन बढ़ाएंगी, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में विकास और रोज़गार के नए रास्ते भी खोलेंगी।





