पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद मटुआ समुदाय के बीच चिंता का माहौल बन गया है। ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से लाखों नाम हटने के बाद कई परिवारों को डर सता रहा है कि कहीं उनका वोट देने का अधिकार ही न छिन जाए। यह वही समुदाय है, जिसने 2019 के बाद बीजेपी को बंगाल में मजबूत आधार दिया था।
मटुआ वोट बैंक पर क्यों मंडरा रहा खतरा
मटुआ समुदाय की बड़ी आबादी उत्तर 24 परगना, नदिया और दक्षिण 24 परगना में रहती है। इन इलाकों की करीब 40 से 50 विधानसभा सीटों पर मटुआ वोट निर्णायक माने जाते हैं। SIR के तहत राज्य में पहली बार 2002 के बाद इतनी सख्त जांच हो रही है, जिससे बीजेपी के मजबूत माने जाने वाले इलाकों में भी बेचैनी बढ़ गई है।
वोटर लिस्ट से हटे लाखों नाम
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, SIR के बाद बंगाल में मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई है। यानी करीब 58 लाख से ज्यादा नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हटाए गए हैं। वहीं करीब 1.66 करोड़ वोटर ऐसे हैं जिन्हें दस्तावेज़ जांच के लिए बुलाया जा सकता है, जिनमें बड़ी संख्या मटुआ समुदाय की बताई जा रही है।
दस्तावेज़ ही सबसे बड़ी परेशानी
मटुआ नेताओं का कहना है कि पलायन और विस्थापन के चलते कई परिवारों के पास जमीन के कागज़, जन्म प्रमाण पत्र या माता-पिता से जुड़ा कोई रिकॉर्ड नहीं है। ऑल इंडिया मटुआ महासंघ के महासचिव महितोष बैद्य के मुताबिक, “अब हमसे कागज़ मांगे जा रहे हैं, लेकिन दिखाएं तो क्या दिखाएं?”
CAA से जुड़े सर्टिफिकेट भी अभी वोटर वेरिफिकेशन में मान्य नहीं माने जा रहे, जिससे डर और बढ़ गया है।
BJP को क्यों हो सकता है सियासी नुकसान
2019 लोकसभा और 2021 विधानसभा चुनाव में बीजेपी की बंगाल में बढ़त का बड़ा कारण मटुआ समुदाय का समर्थन रहा है। बोंगांव और रनाघाट जैसी सीटों पर मटुआ वोटों ने टीएमसी को पीछे छोड़ा था। लेकिन अगर SIR की दूसरी प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मटुआ वोटर बाहर हो जाते हैं, तो इसका सीधा असर 2026 विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटों पर पड़ सकता है।
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अब आगे क्या होगा?
चुनाव आयोग ने कहा है कि जिन वोटरों को ‘अनमैप्ड’ बताया गया है, उन्हें 15 जनवरी तक सुनवाई का मौका मिलेगा और 14 फरवरी को फाइनल वोटर लिस्ट जारी होगी। अब देखना ये है कि SIR बीजेपी के लिए सुधार बनेगा या फिर वही प्रक्रिया पार्टी को बंगाल में भारी नुकसान पहुंचा देगी।






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