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30 रुपये के कुरकुरे और ‘डर’ की वो अंधेरी रात जब दो मासूमों की मुस्कान ने दी पुलिस को कड़ी परीक्षा
नरसिंहपुर। जिले के गोटेगांव में बीते मंगलवार की शाम ढलते ही दो घरों के चूल्हे ठंडे पड़ गए थे। एक 9 साल की नन्हीं बिटिया और उसकी 8 साल की चचेरी बहन अचानक गायब हो गईं। वक़्त बीतने के साथ परिजनों की धड़कनें बढ़ रही थीं, क्योंकि खेत की टपरिया जहाँ कुछ देर पहले बच्चों की किलकारियां गूँज रही थीं, वहां अब सिर्फ सन्नाटा था।
एक छोटी सी भूल और मासूमों का खौफ
वजह सिर्फ़ 30 रुपये थी। मासूमियत में उन बच्चियों ने घर से पैसे निकालकर कुरकुरे खा लिए थे। लेकिन कुरकुरे का वो स्वाद जल्द ही “डांट के डर” में बदल गया। उन्हें लगा कि घर लौटने पर उन्हें सजा मिलेगी। बस इसी डर ने उन नन्हे कदमों को घर से दूर, खेतों के अंधेरे की ओर मोड़ दिया।
ऑपरेशन मुस्कान जब वर्दी ने निभाया ‘अभिभावक’ का फर्ज
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक डॉ. ऋषिकेश मीणा ने तुरंत कमान संभाली। एसडीओपी मनीष त्रिपाठी के नेतृत्व में चार विशेष टीमें रात के अंधेरे को चीरते हुए निकल पड़ीं। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और सीसीटीवी खंगाले गए, लेकिन बच्चियों का सुराग नहीं मिला।
पुलिस की टीमें जब ग्राम कमती के ‘सेमरावारी’ खेत पहुंचीं, तो वहां झाड़ियों के पीछे सिसकियों की आवाज सुनाई दी। एक पुराने ‘कोहा’ के पेड़ के नीचे, कड़कड़ाती ठंड और डर से सहमी हुई दोनों मासूम बच्चियां छिपी हुई।
मिलन के वे भावुक
पलजब पुलिस ने उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला और उनके परिजनों को सौंपा, तो मानो पूरे गांव ने राहत की सांस ली।
डर की जगह आंसू डांट के जिस डर से वे भागी थीं, वहां उन्हें सिर्फ गले लगाकर रोते हुए मां-बाप मिले।
सफलता गोटेगांव पुलिस की मुस्तैदी ने चंद घंटों के भीतर ही इन मासूमों को किसी अनहोनी का शिकार होने से बचा लिया।
एक सीख यह घटना हमें याद दिलाती है कि बच्चों का मन कांच की तरह नाजुक होता है। कभी-कभी छोटी सी डांट का डर उन्हें ऐसे फैसले लेने पर मजबूर कर देता है जो जानलेवा साबित हो सकते हैं।





