गुजरात से सामने आया यह मामला इंसाफ के सिस्टम की सबसे दर्दनाक तस्वीर दिखाता है। सिर्फ 20 रुपये की रिश्वत के आरोप में एक पुलिस कॉन्स्टेबल बाबूभाई प्रजापति को लगभग 30 साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। इस छोटे से आरोप ने उनकी पूरी जिंदगी, नौकरी, इज्जत और परिवार सब कुछ छीन लिया।
1996 में क्या हुआ था?
20 नवंबर 1996 को वीजलपुर पुलिस स्टेशन में तैनात बाबूभाई प्रजापति और दो अन्य कॉन्स्टेबलों पर आरोप लगा कि वे ट्रक ड्राइवरों से 20-20 रुपये लेकर शहर में अवैध एंट्री दे रहे थे। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने जाल बिछाकर तीनों को गिरफ्तार किया और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज कर दिया।
कोर्ट, तारीखें और लंबा इंतज़ार
1997 में चार्जशीट दाखिल हुई, 2002 में आरोप तय हुए और 2003 में गवाहों की सुनवाई शुरू हुई। 2004 में सेशंस कोर्ट ने बाबूभाई को दोषी मानते हुए 4 साल की सजा और 3000 रुपये जुर्माना ठोक दिया। इसी के साथ उनकी नौकरी भी चली गई। तब बाबूभाई की उम्र करीब 34 साल थी।
22 साल बाद हाईकोर्ट से मिली बेगुनाही
बाबूभाई ने सेशंस कोर्ट के फैसले को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी। लेकिन फैसला आने में 22 साल लग गए। आखिरकार 4 फरवरी 2025 को हाईकोर्ट ने उन्हें सम्मानपूर्वक बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते और अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
इंसाफ मिला… लेकिन जिंदगी छूट गई
फैसले के बाद बाबूभाई ने अपने वकील से कहा,
“अब मेरी जिंदगी से दाग मिट गया है। अगर भगवान अब बुला लें, तो भी कोई गम नहीं।”
दुर्भाग्य से, अगले ही दिन उनकी नींद में मौत हो गई। बताया गया कि उन्हें हार्ट अटैक आया। जिस इंसाफ के लिए उन्होंने आधी उम्र लगा दी, उसका सुख वो एक दिन भी ठीक से नहीं जी पाए।
यह कहानी सिर्फ बाबूभाई प्रजापति की नहीं है, बल्कि उन हजारों लोगों की है जो छोटे आरोपों में फंसकर पूरी जिंदगी कोर्ट-कचहरी में गंवा देते हैं। सवाल यही है—अगर इंसाफ इतना देर से मिले, तो क्या उसे इंसाफ कहा जा सकता है?
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