सनातन धर्म में गंगौर व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित होता है। उत्तर भारत के कई राज्यों जैसे राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश में महिलाएं इस व्रत को बड़ी श्रद्धा से रखती हैं। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर माता गौरी वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं। विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए और कुंवारी लड़कियां अच्छा जीवनसाथी पाने के लिए यह व्रत रखती हैं।
गंगौर व्रत का धार्मिक महत्व
गंगौर शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – “गण” और “गौरी”। यहां गण का अर्थ भगवान शिव से और गौरी का अर्थ माता पार्वती से माना जाता है। यह पर्व पति-पत्नी के अटूट प्रेम और दांपत्य सुख का प्रतीक माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप और व्रत किया था। उसी परंपरा से गंगौर व्रत की शुरुआत हुई। इसलिए इस दिन महिलाएं पूरे मन से पूजा करके सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
गंगौर व्रत 2026 की सही तिथि
पंचांग के अनुसार साल 2026 में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 21 मार्च को पड़ रही है। यह तिथि 21 मार्च 2026 को सुबह 2:30 बजे शुरू होगी और रात 11:56 बजे समाप्त होगी। इसलिए इस साल गंगौर व्रत शनिवार, 21 मार्च 2026 को रखा जाएगा। कई जगहों पर इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है और महिलाएं लोकगीत गाकर माता गौरी की पूजा करती हैं।
गंगौर पूजा के शुभ मुहूर्त
गंगौर के दिन पूजा सही मुहूर्त में करने से विशेष फल मिलता है।
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सूर्योदय: सुबह 6:24 बजे
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ब्रह्म मुहूर्त: 4:49 बजे से 5:36 बजे तक
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:04 से 12:52 बजे तक
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शाम की संध्या: 6:32 से 7:43 बजे तक
इन समयों में पूजा करना बेहद शुभ माना जाता है। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं शाम के समय गौरी माता के गीत गाते हुए पूजा करती हैं।
गंगौर व्रत की देसी पूजा विधि
गंगौर व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे कपड़े पहनें। घर के मंदिर में एक चौकी रखकर उस पर लाल कपड़ा बिछाएं। इसके बाद मिट्टी से गौरी माता और भगवान शिव की छोटी-सी प्रतिमा बनाकर स्थापित करें।
अब पास में एक कलश रखें और विधि-विधान से पूजा शुरू करें। देवी-देवताओं को फूल, चावल, फल, मिठाई, धूप-दीप अर्पित करें। इसके बाद गंगौर व्रत की कथा सुनें और आरती करें।
शाम के समय दोबारा गण-गौरी की पूजा की जाती है। कई जगह महिलाएं नदी या तालाब में प्रतिमा का विसर्जन भी करती हैं। अंत में जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है।
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