कांग्रेस में सिर्फ वो रहेगा जो गांधी परिवार का वफादार होगा, सिर्फ कांग्रेस का वफादार नहीं चलेगा। अमरिंदर और सिद्धू का झगड़ा, कमलनाथ और सिंधिया का झगड़ा, अशोक गहलोत और सचिन पायलट का झगड़ा... अगर आपको ऐसा लगता है कि यह आपस में झगड़ रहे हैं, तो आप गलत सोच रहे हैं। दरअसल इन को लड़ाया जा रहा है। 

गांधी परिवार की आदत में शामिल है कि वह राज्य के किसी भी नेता को कभी भी ताकतवर नहीं होने दे देते हैं। अगर कोई नेता ताकतवर होने की कोशिश करता है तो किसी दूसरे नेता से उसकी लड़ाई करा दी जाती है। उसके बाद भले ही कांग्रेस का बलिदान हो जाए, कांग्रेस की सरकार चली जाए, वे कभी इस बात की चिंता नहीं करते हैं। हां, लेकिन गांधी परिवार की बात मानने वाला व्यक्ति ही राज्य में अपनी जिम्मेदारी निभाएगा।

कांग्रेस की प्रक्रिया है कि वह जिस व्यक्ति को राज्य का मुख्यमंत्री बनाती है, उसके धुर विरोधी को राज्य का कांग्रेस का अध्यक्ष बनाती है और दोनों के विरोधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर उस राज्य का प्रभारी बनाती है। इससे यह तीन लोग हमेशा आपस में लड़ते हैं और कोई ताकतवर आदमी जो यह समझे कि उसकी ताकत से कांग्रेस को सत्ता मिली है उसे कांग्रेस खत्म कर देती है। ऐसे कई उदाहरण हैं मेरे पास। के. करुणाकरन और एके एंटोनी का विवाद, हेमंत विश्व शर्मा और राज्य के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का विवाद, वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी से गांधी परिवार का विवाद इसके उदाहरण हैं। 

गांधी परिवार ने अपने अहंकार के लिए सतपाल महाराज और हरीश रावत को मुख्यमंत्री ना बनाकर विजय बहुगुणा को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया था। इसी प्रकार 1980 में मध्य प्रदेश के उस समय के ताकतवर नेता शिवभानु सिंह सोलंकी के स्थान पर अर्जुन सिंह को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाना, अशोक गहलोत की सरकार को अस्थिर करके के लिए सचिन पायलट को ताकत देना, कमलनाथ को अस्थिर करने के लिए सिंधिया को ताकत देना, यहयह सब कांग्रेस की कार्यप्रणाली का हिस्सा है और कांग्रेस में वही बचता है जो अपनी ताकत से ज्यादा गांधी परिवार की ताकत पर विश्वास करता है। 

इसलिए अमरिंदर सिंह जो अपने आप को कांग्रेस का बड़ा नेता मान रहे थे, उनके पर कतरने के लिए सिद्धू को कांग्रेस ने आगे बढ़ाया और आज प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। अब भले ही अमरिंदर कांग्रेस को छोड़कर चले जाएं, लेकिन गांधी परिवार का आशीर्वाद उनको नहीं मिलेगा। गांधी परिवार के कारण ही सिंधिया को कांग्रेस छोड़नी पड़ी, हेमंत विश्व शर्मा को कांग्रेस छोड़नी पड़ी, जगनमोहन रेड्डी को अपनी पिता की मृत्यु के बाद कांग्रेस छोड़नी पड़ी, सतपाल महाराज को कांग्रेस छोड़नी पड़ी... संदेश साफ है कि जो गांधी परिवार का व्यक्तिगत वफादार होगा, वही कांग्रेस में रहेगा, वरना दरवाजा खुला है।